20150722

जीवन” का नवीन अर्थ - पिज्जा

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भूले
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पत्नी ने कहा - आज धोने के लिए ज्यादा कपड़े मत निकालना…

पति- क्यों??
उसने कहा..- अपनी काम वाली बाई दो दिन नहीं आएगी…
पति- क्यों??
पत्नी- गणपति के लिए अपने नाती से मिलने बेटी के यहाँ जा रही है, बोली थी…
पति- ठीक है, अधिक कपड़े नहीं निकालता…
पत्नी- और हाँ!!! गणपति के लिए पाँच सौ रूपए दे दूँ उसे? त्यौहार का बोनस..
पति- क्यों? अभी दिवाली आ ही रही है, तब दे देंगे…
पत्नी- अरे नहीं बाबा!! गरीब है बेचारी, बेटी-नाती के यहाँ जा रही है, तो उसे भी अच्छा लगेगा… और इस महँगाई के दौर में उसकी पगार से त्यौहार कैसे मनाएगी बेचारी!!
पति- तुम भी ना… जरूरत से ज्यादा ही भावुक हो जाती हो…
पत्नी- अरे नहीं… चिंता मत करो… मैं आज का पिज्जा खाने का कार्यक्रम रद्द कर देती हूँ… खामख्वाहपाँच सौ रूपए उड़ जाएँगे, बासी पाव के उन आठ टुकड़ों के पीछे…
पति- वा, वा… क्या कहने!! हमारे मुँह से पिज्जा छीनकर बाई की थाली में??
तीन दिन बाद… पोंछा लगाती हुई कामवाली बाई से पति ने पूछा...
पति- क्या बाई?, कैसी रही छुट्टी?
बाई- बहुत बढ़िया हुई साहब… दीदी ने पाँच सौ रूपए दिए थे ना.. त्यौहार का बोनस..
पति- तो जा आई बेटी के यहाँ…मिल ली अपने नाती से…?
बाई- हाँ साब… मजा आया, दो दिन में 500 रूपए खर्च कर दिए…
पति- अच्छा!! मतलब क्या किया 500 रूपए का??

बाई- नाती के लिए 150 रूपए का शर्ट, 40 रूपए की गुड़िया, बेटी को 50 रूपए के पेढे लिए, 50 रूपए के पेढे मंदिर में प्रसाद चढ़ाया, 60 रूपए किराए के लग गए.. 25 रूपए की चूड़ियाँ बेटी के लिए और जमाई के लिए 50 रूपए का बेल्ट लिया अच्छा सा… बचे हुए 75 रूपए नाती को दे दिए कॉपी-पेन्सिल खरीदने के लिए… झाड़ू-पोंछा करते हुए पूरा हिसाब उसकी ज़बान पर रटा हुआ था…

पति- 500 रूपए में इतना कुछ???

वह आश्चर्य से मन ही मन विचार करने लगा...उसकी आँखों के सामने आठ टुकड़े किया हुआ बड़ा सा पिज्ज़ा घूमने लगा, एक-एक टुकड़ा उसके दिमाग में हथौड़ा मारने लगा… अपने एक पिज्जा के खर्च की तुलना वह कामवाली बाई के त्यौहारी खर्च से करने लगा… पहला टुकड़ा बच्चे की ड्रेस का, दूसरा टुकड़ा पेढे का, तीसरा टुकड़ा मंदिर का प्रसाद, चौथा किराए का, पाँचवाँ गुड़िया का, छठवां टुकड़ा चूडियों का, सातवाँ जमाई के बेल्ट का और आठवाँ टुकड़ा बच्चे की कॉपी-पेन्सिल का..आज तक उसने हमेशा पिज्जा की एक ही बाजू देखी थी, कभी पलटाकर नहीं देखा था कि पिज्जा पीछे से कैसा दिखता है… लेकिन आज कामवाली बाई ने उसे पिज्जा की दूसरी बाजू दिखा दी थी… पिज्जा के आठ टुकड़े उसे जीवन का अर्थ समझा गए थे… “जीवन के लिए खर्च” या “खर्च के लिए
जीवन” का नवीन अर्थ एक झटके में उसे समझ आ गया…

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20150719

''आपके हिसाब से इस गिलास का वज़न कितना होगा?''....



एक प्रोफ़ेसर ने अपने हाथ में पानी से भरा एक गिलास पकड़ते हुए अध्यापन शुरू किया ।
उन्होंने उसे ऊपर उठा कर सभी छात्रों को दिखाया और पूछा ,
''आपके हिसाब से इस गिलास का वज़न कितना होगा?''
50 ग्राम….
100 ग्राम…
125 ग्राम'…
छात्रों ने उत्तर दिया ।
जब तक मैं इसका वज़न ना कर लूँ
मुझे इसका सही वज़न नहीं बता सकता.
प्रोफ़ेसर ने कहा. ”पर मेरा सवाल है,
यदि मैं इस ग्लास को थोड़ी देर तक इसी तरह उठा कर पकडे रहूँ तो क्या होगा ?
‘कुछ नहीं’ …छात्रों ने कहा.
‘अच्छा , अगर मैं इसे मैं इसी तरह एक घंटे तक उठाये रहूँ तो क्या होगा ?' ,
प्रोफ़ेसर ने पूछा.
‘आपका हाथ दर्द करने लगेगा’,
एक छात्र ने कहा.
'तुम सही कह रहे हो,
अच्छा अगर मैं इसे इसी तरह पूरे दिन उठाये रहूँ तो का होगा?'
”आपका हाथ सुन्न हो सकता है,
आपके मांसपेशियों में भारी तनाव आ सकता है,
लकवा मार सकता है
और पक्का आपको अस्पताल जाना पड़ सकता है”…
.किसी छात्र ने कहा,
और बाकी सभी हंस पड़े…
“बहुत अच्छा ,
पर क्या इस दौरान गिलास
का वज़न बदला?”
प्रोफ़ेसर ने पूछा.
उत्तर आया
..”नहीं”
”तब भला हाथ में दर्द और मांशपेशियों में तनाव क्यों आया?”
छात्र अचरज में पड़ गए.
फिर प्रोफ़ेसर ने पूछा
” अब दर्द से निजात पाने के लिए मैं क्या करूँ?”
”ग्लास को नीचे रख दीजिये!
एक छात्र ने कहा.
”बिलकुल सही!”
प्रोफ़ेसर ने कहा.
जीवन की समस्याएं भी कुछ इसी तरह
होती हैं.
इन्हें कुछ देर तक अपने दिमाग में
रखिये
और लगेगा की सब कुछ ठीक है
उनके बारे में ज्यदा देर सोचिये
और आपको पीड़ा होने लगेगी.
और इन्हें और भी देर तक अपने दिमाग में रखिये
और ये आपको लकवाग्रस्त करने लगेंगी.
और आप कुछ नहीं कर पायेंगे.
अपने जीवन में आने
वाली चुनातियों और समस्याओं के बारे में सोचना ज़रूरी है,
पर उससे भी ज्यादा ज़रूरी है
दिन के अंत में सोने जाने से पहले उन्हें नीचे रखना.
इस तरह से, आप तनावग्रस्त नहीं रहेंगे,
आप हर रोज़ मजबूती और ताजगी के साथ उठेंगे और सामने आने
वाली किसी भी चुनौती का सामना कर सकेंगे .....।
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20150705



माँ ने एक शाम दिनभर की लम्बी थकान एवं काम के बाद जब डिनर बनाया तो उन्होंने पापा के सामने एक प्लेट सब्जी और एक जली हुई रोटी परोसी।

मूझे लग रहा था कि इस जली हुई रोटी पर पापा कुछ कहेंगे, परन्तु पापा ने उस रोटी को आराम से खा लिया।

हालांकि मैंने माँ को पापा से उस जली रोटी के लिए "साॅरी" बोलते हुए जरूर सुना था।

और मैं ये कभी नहीं भूल सकता जो पापा ने कहा: "मूझे जली हुई कड़क रोटी बेहद पसंद हैं।"

देर रात को मैंने पापा से पूछा, क्या उन्हें सचमुच जली रोटी पसंद हैं?

उन्होंने कहा- "तुम्हारी माँ ने आज दिनभर ढ़ेर सारा काम किया, ओर वो सचमुच बहुत थकी हुई थी।

और वैसे भी एक जली रोटी किसी को ठेस नहीं पहुंचाती परन्तु कठोर-कटू शब्द जरूर पहुंचाते हैं।

तुम्हें पता है बेटा - "जिंदगी भरी पड़ी है अपूर्ण चीजों से...अपूर्ण लोगों से... कमियों से...दोषों से...

मैं स्वयं सर्वश्रेष्ठ नहीं, साधारण हूँ , और शायद ही किसी काम में ठीक हूँ।

मैंने इतने सालों में सीखा है कि "एक दूसरे की गलतियों को स्वीकार करना... 
नजरंदाज करना... 
आपसी संबंधों को सेलिब्रेट करना।"

मित्रों, जिदंगी बहुत छोटी है...
उसे हर सुबह-शाम दु:ख...पछतावे...
खेद में बर्बाद न करें।

जो लोग तुमसे अच्छा व्यवहार करते हैं, उन्हें प्यार करें और जो नहीं करते उनके लिए दया, सहानुभूति रखें।
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